203 साल पुरानी परंपरा: 12 किलो की जलती बनाटी से दिखाएंगे हैरतअंगेज करतब
दो दिन तक तेल में भिगोकर तैयार की जाती है मशाल, सिर के ऊपर और पैरों के नीचे से घुमाते हैं अग्नि से लिपटी लकड़ी

बीकानेर। दीपावली केवल दीपों और लक्ष्मी पूजन का पर्व नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक आयोजनों को सहेजने का अवसर भी है। बीकानेर के बारह गुवाड़ चौक में ऐसी ही एक अनूठी परंपरा पिछले 203 वर्षों से निभाई जा रही है। यहां रूप चतुर्दशी की रात 7 नवंबर को बनाटी घुमाने का पारंपरिक आयोजन होगा। रात नौ बजे होने वाले इस आयोजन में युवा और अनुभवी लोग जलती मशाल के साथ हैरतअंगेज करतब दिखाएंगे।
आठ से 12 किलो तक होता है बनाटी का वजन
बनाटी घुमाना शारीरिक दक्षता, संतुलन और साहस का अनूठा प्रदर्शन है। लकड़ी के दोनों सिरों पर जलती मशाल बांधी जाती है, जिसका कुल वजन आठ से 12 किलो तक होता है। इसे सिर के ऊपर से लेकर पैरों के नीचे तक तेजी से घुमाकर विभिन्न करतब दिखाए जाते हैं। यह कला सहजता से नहीं सीखी जा सकती। इसके लिए उस्ताद के नेतृत्व में लंबे समय तक अभ्यास करना पड़ता है। इस बार भी आयोजन की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं और प्रतिभागी पिछले एक महीने से अभ्यास में जुटे हैं।
दो दिन तेल में भिगोकर तैयार होती है मशाल
ईश्वर महाराज और शेर महाराज बताते हैं कि बनाटी तैयार करना भी अपने आप में एक कला है। लकड़ी के दोनों सिरों पर सूत के कोड़े बांधे जाते हैं। इन्हें दो दिन तक तेल में भिगोकर रखा जाता है, ताकि मशाल लंबे समय तक जलती रहे। बनाटी के दोनों सिरों का वजन और आकार एक समान रखा जाता है, जिससे घुमाते समय संतुलन बना रहे। पहले इसके लिए जूट का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन अब गाढ़ेपन और देर तक जलने की वजह से तेल का उपयोग किया जाता है।
बच्चों से बुजुर्गों तक लेते हैं भाग
इस आयोजन में बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों तक की सहभागिता रहती है। जलती मशाल और भारी लकड़ी के साथ गति व संतुलन बनाकर करतब दिखाना जोखिम भरा होता है। एक छोटी सी चूक भी नुकसान पहुंचा सकती है। आसपास के मोहल्लों के लोग तेज आवाज में नारे लगाकर प्रतिभागियों का उत्साह बढ़ाते हैं। मां लक्ष्मी और भैरूनाथ की कृपा से अब तक यह परंपरा निर्विघ्न चलती आई है।
पूर्वजों की स्मृति में होता है आयोजन
यह आयोजन सनाथा महाराज, फागणिया मारजा एवं पागा मारजा की पावन स्मृति में किया जाता है। वर्तमान में ईश्वर महाराज एवं बारह गुवाड़ के गणमान्य लोगों के सानिध्य में यह परंपरा आगे बढ़ रही है। दो शताब्दियों से अधिक समय से चली आ रही यह परंपरा बीकानेर की सांस्कृतिक पहचान और सामूहिक सहभागिता का अनूठा उदाहरण है।

