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एक गोली बदल देगी दुनिया, पाठकों की राय पर तीनों भाग एक साथ प्रस्तुत है One pill will change the world, the three parts are presented together on the opinion of the readers

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प्रिय पाठकों
आपने साइंस फिक्शन पर आधारित मेरी स्टोरी ‘एक गोली बदल देगी दुनिया’ के तीनों भाग पढ़ें। इसके लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद। बहुत से पाठकों ने इस स्टोरी को सराहा और रिक्वेस्ट भेजी की कि तीनों भागों को एक साथ पोस्ट किया जाए तो पढ़ने में अंत तक तारतम्य बना रहेगा। आप पाठकों की राय का सम्मान करते हुए आज तीनों भागों को एक साथ पोस्ट कर रहा हूँ। यहां बताना चाहता हूँ कि यह स्टोरी जून 2019 में साइंस मीडिया वर्कशाप में मशहूर साइंस फिक्शन राइटर हरिश गोयल के मार्गदर्शन में लिखी थी। फिक्शन लिखने की प्रेरणा वैज्ञानिक दृष्टिकोण पाक्षिक के संपादक तरूण के जैन से मिली। स्टोरी को फाइनल टच देने में परम मित्र डी पी जोशी का महत्वपूर्ण सहयोग रहा। इस स्टोरी में यह बताया गया है कि धरती पर आबादी बढ़ने से दुनिया की कितनी भयावह तस्वीर सामने आएगी और इस आपदा से कैसे दुनियाभर के वैज्ञानिक निपटेंगे और समाधान के बाद किस तरह के बदलाव आएंगे आदि घटनाओं का समावेश किया गया है।
आज कोरोना संक्रमण से जो हालात बने हैं करीब करीब ऐसे ही हालातों का जिक्र जून 2019 में लिखी अपनी इस स्टोरी में कर चुका हूं। इस स्टोरी की एक प्रति आयोजकों के पास सुरक्षित है। आप से आग्रह है कि स्टोरी को अंत तक पूरा पढ़ें और बताए तीनों भाग एक साथ पढ़कर स्टोरी कैसी लगी अपने विचारों से जरूर अवगत कराएं।
मेरा ई-मेल आईडी है [email protected] राजेश रतन व्यास
एडिटर एंड मैनेजिंग डायरेक्टर द इंडियन डेली (TID NEWS)
theindiandaily.in

एक गोली बदल देगी दुनिया
बीकानेर। आज मौसम बड़ा सुहाना है। शीतल बयार चल रही है। मैं और मेरा दोस्त राजीव रोज की तरह घर से दो किलोमीटर दूर गणेश मंदिर पैदल घूमने निकले, लेकिन मौसम अनुकूल होने के बावजूद कुछ घूटन महसूस हो रही थी। सड़क पर इतनी भीड़ कि मन कर रहा था बीच रास्ते से ही घर चला जाऊं। तभी राजीव बोला यार, पहले सड़कें चैड़ाई में कम थी फिर भी हम आसानी से कम समय में घर पहुंच जाते थे और अब चैड़े चैड़े हाइवे होने के बावजूद रेंग रेंग कर घर पहुंचते हैं।
हम कैसे ही करके मंदिर पहुंचे तो वहां भी भीड़ और शौर से मन खट्टा हो रहा था। राजीव बोला अभी दस बजे है। एक घंटे में भीड़ कम हो जाएगी तब तक बगीचे में बैठते हैं। हमारे कदम बगीचे की ओर बढ़ गए। वहां हमेशा की तरह एक बुजुर्ग चिकित्सक प्रो. राधे मोहन बैठे थे। हम भी उनके पास जाकर बैठ गए। प्रोफेसर हमें देखकर मुस्कराएं तो हमने भी उन्हें नमस्कार किया और परिचय करते हुए भीड़, शौर, महंगाई पर बात करने लगे।
धरती पर इंसानी आबादी का संसाधनों की उपलब्धता से बेहतर तालमेल था। सब कुछ खुला खुला शांत। धरती स्वर्ग सी लगती थी। यह जानकारी देते हुए प्रोफेसर राधे मोहन कहने लगे कि अब हालात बहुत बिगड़ चुके है। लगता है इंसान के नियंत्रण में कुछ नहीं रहा। रोज रोज भोजन पानी के लिए झगड़े, सड़कों पर ट्रेफिक जाम में आगे निकलने की होड़ में झगड़े आदि अखबारों में पढ़ने को मिल रहे हैं। मैने प्रोफेसर से कहा कि सर आपके समय में क्या हालात थे। तो वो बोले बेटा तब 12 साल पहले 2020 में धरती की आबादी 7.6 अरब थी और हालात उस समय बिगड़ने शुरू हुए ही थे और तब हमने इन समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन अब जब 2030 में धरती की आबादी 17 अरब से ऊपर जा रही है तो इसके गंभीर परिणाम आने लगे हैं। यही वजह है कि अब इंसान भी जल्दी जल्दी ऊपर जाने लगा है। मुस्कराते हुए प्रोफेसर ने अपनी चिंता जताई।
तभी प्रोफेसर की ओर मुखातिब होकर राजीव बोला
सर, अब तो धरती पर भोजन पानी के लिए संघर्ष चल रहा है, लेकिन इस समस्या का समाधान क्या हो सकता है?
कुछ सोचने के बाद प्रोफेसर बोले बढ़ती आबादी एवं घटते संसाधन दुनियाभर के वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी चुनौती है। तभी मेरा एक शोध का साथी अरूण बगीचे में आ पहुंचा और बोला आप लोगों को पता है पंजाब सरकार क्या करने जा रही है। हम सब एक साथ बोल पड़े नहीं मालूम-
फिर टीवी पर चल रही ब्रेकिंग न्यूज के बारे में अरूण बताने लगा कि पूरी धरती पीने योग्य पानी से जूझ रही है। हमारे देश में राजस्थान में कुएं सूख चुके हैं। ऐसे में पंजाब, राजस्थान का पानी बंद कर रहा है क्योंकि उसके निवासियों के लिए पानी बहुत कम पड़ रहा है। इससे दोनों राज्यों में तनाव हो गया है। अरूण ने इससे भी बड़ी बात बताई कि ये हालात भारत ही नहीं वरन अमेरिका, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन जैसे देशों में भी हो चुके हैं। अति गरीब देश नेपाल, भूटान, सोमालिया, यूगांडा, अफगानिस्तान में तो लोग भूख से मर रहे हैं और कहीं कहीं तो खाद्य पदार्थों को लेकर इंसान एक दूसरे को मार कर खा रहे हैं। इस समाचार से सबका मन खट्टा हो गया। अब भगवान से अच्छे के लिए प्रार्थना करते हैं और घर चले। ऐसा कहकर मैं, राजीव, अरूण व प्रोफेसर बगीचे से बाहर आ गए और अपने अपने घरों की ओर बढ़ गए।
मैं घर पहुंचा और सोने के लिए पलंग पर लेटा, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। तब टीवी चलाई और न्यूज चैनल देखने बैठ गया। न्यूज में भी यही बताया जा रहा था कि धरती पर भोजन के लिए संघर्ष चरम पर है। इतना सुना और मैंने टीवी बंद कर दिया। इस बीच कब नींद लगी पता ही नहीं चला। सुबह देर से नींद टूटी तो वही रात वाली चर्चा परेशान कर रही थीं। क्योंकि हमारे शहर के भी यही हालात थे। खैर दैनिक कार्यों से निवृत होकर किचन में गया तो पत्नी रेखा बोली आटा आज आज का ही है और बाजार में भी उपलब्ध नहीं है। इसलिए खाने के लिए जो भी मिले आते हुए ले आना। पत्नी ने पोहा बनाया, लेकिन आधे भूखे पेट ही आॅफिस निकल गया। पत्नी की आंखे छलछला गई और कहने लगी कि पैसे है, लेकिन बाजार में राशन का अभाव है और आप भूखे जा रहे हैं। मैने बाइक स्टार्ट करते हुए कहा चिंता मत करो मैं ठीक हूं और तेजी से आगे निकल गया। आॅफिस जाते ही जरूरी काम पूरे किए तब तक लंच का समय हो गया। हम आॅफिस में एक ही जगह बैठकर लंच करते हैं। इसलिए सीट से उठा और लंच वाले स्थान की ओर बढ़ गया।
यह क्या, जहां मेरे सहकर्मी लंच करते हैं वहां कोई भी नजर नहीं आया।
तो मैने जूनियर साथी राकेश से पूछा कि क्या बात है आज सारे भूख हड़ताल पर है क्या?
उदास से मुंह लटकाए राकेश ने कहा शहर में खाद्य सामग्री की आपूर्ति एक सप्ताह बाद होगी। इसलिए सभी ने अन्न का स्टोरेज करना शुरू कर दिया है और भूख से बहुत कम खा रहे हैं। आज कोई भी लंच नहीं लाया। सिर नीचे झुकाए राकेश ने बताया कि बिहार में मेरे गांव में एक दर्जन लोग भूख से मर गए हैं। सर, पता नहीं क्या होगा सरकारें कुछ नहीं कर रही। इसके बाद हम दोनों चुपचाप कुछ सोचने लगें तभी मेरी नजर आॅफिस में टेबल पर पड़े अखबारों पर पड़ी तो सभी अखबार खाद्य सामग्री के अभावों एवं इनसे दुनियाभर में हो रही मौतों के आंकड़ों से भरे पड़े थे। इस बीच घड़ी पर नजर पड़ी तो याद आया कि लंच टाइम खत्म हो चुका है, फिर बुझे मन से मैं और राकेश आॅफिस कार्य में व्यस्त हो गए। दोपहर ढलने लगी। आॅफिस का काम करते करते घर जाने का समय हो जाता है।
मैं आॅफिस से घर के लिए निकला ही था कि अचानक पत्नी रेखा की बात याद आ गई। मुझे डिनर के लिए कुछ लेकर घर जाना है। पर यह क्या बाजार सूने है, जहां दुकानें खुली थी वहां दुकानदार मनमाने दाम पर बेहद कम मात्रा में खाद्य सामग्री दे रहे थे। काफी ढूढ़ने के बाद एक पुरानी से दुकान नजर आई। लेकिन वहां 30 से 40 गुना महंगे दाम पर खाद्य सामग्री मिल रही थीं। कुछ सोचने के बाद आलू व ब्रेड लेकर घर पहुंचा। रेखा ने दरवाजा खोला तो हाथ में खाने की सामग्री देखकर वह मुस्कराई। मैंने जैसे ही रेखा को सामान दिया तो बोली बस, इतने ही। मैंने कहा शुक्र समझो मिल तो गया, वरना बहुत से लोगों को ये भी नहीं मिल रहे।
इस बीच मेरे मोबाइल की घंटी घनघनाने लगी। यह फोन सहकर्मी दिनेश का था। मैने फोन उठाया तो दिनेश बिना हाय हैलो किए बोलने लगा कि आॅफिस के जूनियर साथी राकेश एवं उसके परिवार ने भूख से तड़पने के बाद जहर खा लिया। उस भयावह खबर को सुनकर मैं सन्न रह गया। एक साथ एक ही परिवार के दो दर्जन लोगों के दुखद अंत ने मुझे पूरी तरह से हिला दिया। मोबाइल मेरे हाथ से छूट जाता है।
ऐसा क्या कह दिया आॅफिस वालों ने कि फोन भी हाथ ही से छूट गया। तबियत तो ठीक है ना, क्या हुआ, बताओ तो सही घबराई हुई रेखा के तेज स्वर में सवालों की बौछारों से मेरा ध्यान हटा तो उसके सामने सारी घटना का खुलासा किया। हे भगवान कैसी कैसी परीक्षा लेगा और कब तक लेगा? ऐसा कह कर रेखा किचन में डिनर की तैयारी करने चली गई। डिनर करने के बाद मैं घर की छत पर यूं ही ठहलने लगा। धीरे-धीरे रात गहराने लगी। तो बैडरूम में सोने चला गया, लेकिन नींद तो आस-पास ही नहीं फटक रही थी। तभी अचानक रेखा जोर से चिल्लाई और बोली जल्दी इधर आओ, इधर आओ। मैं बुरी तरह से घबरा गया कि कहीं भूख ने हमारे परिवार या पड़ौसी को तो नहीं जकड़ लिया। पत्नी कमरे में बैठी हंस रही थी। मुझे टीवी न्यूज की ओर इशारा करते हुए बोली कि ध्यान से सुनो। मेरा ध्यान टीवी पर चल रहे समाचार पर गया। न्यूज रीडर बता रहा था कि दुनियाभर के वैज्ञानिक अपने अपने देशों की आबादी एवं उपलब्ध खाद्य संसाधनों के डेटा जुटाने लग गए हैं। एक भारतीय वैज्ञानिक डाॅ. रामनाथन सभी देशों के वैज्ञानिकों को कह रहे है कि हम खाने की ऐसी क्या चीजें लें जिसे थोड़ी मात्रा में ले और पूरे एक सप्ताह तक कुछ भी खाना न पड़े। जिसे खाने पर इंसान शारीरिक एवं मानसिक रूप से भी स्वस्थ रहे। इतना ही नहीं उसे खाने के बाद वह विपरित परिस्थितियों को भी झेलने में सक्षम हो जाए। मैं भी ऐसी चीजों के बारे में सोचने लगा। भोजन पानी की कमी के लिए जिम्मेदार लोगों के बारे में ध्यान जा रहा था और सोचने लगा कि 20 वीं सदी के लोग आबादी नियंत्रण पर क्यों गंभीर नहीं हुए? उन्होंने धरती की सेहत की जरा भी चिंता नहीं की? इतना ही नहीं 21 वीं सदी के शुरूआत के लोग तो तकनीकी ज्ञान से विकसित थे। उन्होंने भी इस बात की परवाह नहीं की? कम से कम बड़े देश तो इस दिशा में कुछ कदम उठाते, शायद हथियारों की होड़, धरती के खजाने को हड़पने की उनकी सोच ने हम पृथ्वीवासियों को इस दलदल में धकेल दिया। ऐसा सोचते सोचते नींद लग गई।
अगले दिन भी जिज्ञासा खत्म नहीं हुई। नींद खुलते ही हाथ रिमोट और नजर टीवी चैनल पर चली गई। रात वाले ही चैनल को आॅन किया तो न्यूज रीडर बोल रहा था कि डाॅक्टर रामनाथन के आइडिया पर सभी देशों ने सहमति दे दी है और वे शोध में भी जुट गए हैं। इस राहतभरी खबर से कुछ चिंता कम हुई। फिर टीवी आॅफ करते हुए दैनिक कार्य पूरे कर आॅफिस निकला। हर गली मोहल्ले, बाजार एवं कार्यालयों में चिंतित लोग भूख से मरने वालों एवं उससे बचने के लिए हो रहे प्रयासों की खबरों पर ही चर्चा करते नजर आ रहे थे। आॅफिस में मन नहीं लगने से जल्दी घर आ गया और बिना कुछ खाये पीए भूखा ही सो गया।
अगले दिन रविवार को छुट्टी थी इसलिए देर तक सोते रहे, लेकिन सुबह करीब 9 बजे मित्र अरूण व दिनेश ने डोरबेल बजाई तो नींद खुली। पत्नी ने दरवाजा खोला उन्हें ड्राइंग रूम में बैठाया तब तक मैं पहंुच गया। चाय की जगह पानी से ही मेहमानवाजी करने के बाद अरूण बोला कि लगता है अब कुछ अच्छा होगा। मैने पूछा कैसे? तो अरूण बोला आज अखबार में आया है कि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर वैज्ञानिकों की टीम शिफ्टों में 24 घंटे डाॅ. रामनाथन के आइडिया पर काम कर रही है। दिनेश बोला कि सभी देश अपने यहां से सर्वाधिक पौष्टिक तत्वों वाले पौधों के डाटा भारत भेजने लगे हैं। हमारे आयुर्वेद के ज्ञान के कारण वैज्ञानिकों की टीम का नेतृत्व भी डाॅ. रामनाथन को ही सौंपा है। अमेरिका एवं जर्मनी ने तो अपनी एडवांस फूड लैब एवं उपकरण भारत में भेज दिए ताकि हमारे देश में ही कम समय में वह टेबलेट तैयार कर ली जाए। फिर इधर उधर की चर्चा के बाद अरूण व दिनेश चले गए। इस प्रकार समय बीतता गया पता ही नहीं चला और दो माह बीत गए।
तभी एक दिन अखबार में आया कि जिन वैज्ञानिकों को निर्देश दिए थे कि शरीर के लिए जरूरी प्रोटिन, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट, अमीनो एसिड्स, पानी की मात्रा आदि के आवश्यक प्लांट्स का वर्गीकरण तेजी से किया जाए। उनकी इस दिशा में किए गए अनुसंधानों पर मेहनत रंग ला रही है। तब मैं खुश होे कर घर पहुंचा, लेकिन मेरी खुशी फिर से काफूर हो गई। पत्नी रेखा डी-हाइड्रेशन की शिकार हो गई। उसका मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा। पता चला कि पड़ौस के एक परिवार में पांच जने भूख के चलते दुनिया से विदा हो गए। इससे वह घबरा गई। स्थिति को संभालते हुए मैं रेखा को लेकर अस्पताल दौड़ा। वहां भी हालात खतरनाक थे। भूख से व्याकुल डाॅक्टर ने इलाज के लिए मना कर दिया। डाॅक्टर की मनाही से मैं घबरा गया, मन में विचार आने लगे क्या भूख प्यास से रेखा मुझसे हमेशा के लिए जुदा हो जाएगी। मैं रेखा से बहुत प्यार करता हूं। उसके बिना नहीं रह सकता। रेखा दुनिया से चली गई तो बर्बाद हो जाऊंगा। दिमाग में कौंधते इन बुरे विचारों से मेरे हाथ पैर कांपने लगे। फिर कैसे ही करके हिम्मत जुटाई तो याद आया कि जींस की पाॅकेट में बिस्कुट का पैकेट पड़ा है, मैने फटाफट डाॅक्टर को ढूंढ़ा और उसे तुरंत बिस्किट का पैकेट थमाते हुए रेखा का उपचार करने का आग्रह किया।
ठीक है पैसेंट को मेरे केबिन में ले आओ। ऐसा कह कर बिस्किट खाते हुए डाॅक्टर केबिन की ओर बढ़ा और मैं रेखा को लिए उसके पीछे पीछे चल दिया। उपचार शुरू करते हुए डाॅक्टर ने कहा कि पैसा है लेकिन शहर में खाने की चीजें उपलब्ध नहीं है। डाॅक्टर ने रेखा को करीब दो घंटे आॅब्जर्वेशन में रखने के बाद छुट्टी दे दी। हम दोनों घर पहुंचे और मैंने रेखा से आराम करने को कहा और किचन में कुछ बनाने के लिए चला गया।
किचन में राशन की स्थिति से पता चल गया कि पत्नी क्यों बीमार पड़ी। तुरन्त बाजार गया और जो मिला खाने के लिए ले आया। खाते-खाते हम टीवी देख रहे थे कि फिर राहत भरी खबर आई और मेरी पत्नी सक्रिय हो गई। टीवी में न्यूज रीडर बड़े जोश से बोला कि आखिरकार हमारी धरती के वैज्ञानिकों की टीम की मेहनत रंग ला चुकी है। उन्होंने एक ऐसी टेबलेट तैयार कर ली है जिसे खाने के बाद भोजन करने की जरूरत तो नहीं पड़ रही थी, लेकिन यह टेबलेट महज एक डेढ़ दिन तक के लिए ही काम कर रही थी। वैज्ञानिक ऐसी टेबलेट पर काम कर रहे थे जिसमें एक सप्ताह तक भोजन न करना पड़े। यहां यह भी जरूरी था कि एक पौधे या पेड़ से जहां 100 आदमियों का पेट भर रहा था। उसी पेड़ पौधे से एक लाख इंसानों का पेट भरा जा सके। साथ ही उन्हें पानी के लिए भी जल स्रोतों पर निर्भर नहीं रहना पड़े। फिर भी हम निराश नहीं हुए, गली मोहल्लों में लोग गले मिल रहे थे। हमारे पड़ौस की बुजुर्ग महिला पूर्णिमा ताई बोली कि ईश्वर ने इतना किया है तो बाकी भी ठीक कर देगा। इस घटना के ठीक 17 दिन बाद फिर खबर आई कि वैज्ञानिकों का धैर्ये उन्हें सही इनोवेशन की ओर ले जा रहा था। टेबलेट में पानी की समस्या को दूर करने के लिए नारियल, तरबूज व गन्ने के एक्टिव इंग्रेडिएंट्स टेबलेट में मिलाए। यानि पहली टेबलेट में इनके कंटेट मिलाने पर हैरतअंगेज परिणाम सामने आए। एक टेबलेट लेने के बाद एक सप्ताह नहीं बल्कि एक माह तक रोजाना भोजन पानी की जरूरत नहीं पड़ रही। इतना ही नहीं यह टेबलेट बजट फ्रेंडली भी साबित हुई।
फिर अखबार उठाया तो उसमें छपा था कि ग्लोबल डाइट टेबलेट जीडीटी खोज ली है। इसे यह नाम पूरे विष्व के वैज्ञानिकों की मेहनत लगने के लिए दिया गया। यह जो जीटीडी टेबलेट है वह बाॅडी के हारमोन्स को इस तरह से बैलेंस करती है कि एक तो आमाश्य भरी हुई लगे तथा शरीर में उपयोग होने वाली ऊर्जा का इस्तेमाल कम हो और शरीर में सतत तरीके से एटीपी (एडीनोसीन ट्राई फास्फेट-जिसे पावर करेंसी भी कहते हैं और हमारे कोशिका के माइटोकोंड्रीया में निर्मित होता है।) का निर्माण हो जो समय पर पड़ने पर ऊर्जा प्रदान कर सके।
यह टेबलेट जैसे ही कोई व्यक्ति लेता है तब उसके हंगर सेंटर में पेट भरे होने की फीलिंग होने लगती है।
जीटीडी टेबलेट का अन्य फायदा यह है कि मानव शरीर में ऐसे हारमोन का निर्माण करती है जो कि जल व कार्बन डाइ आॅक्साइड लेकर ग्लूकोज का निर्माण कर सकता है ठीक उसी तरीके से यह टेबलेट भी मानव शरीर के अंदर उत्सर्जित सीओटू से ग्लूकोज व हवा में विद्यामान नाइट्रोजन से अमीनो एसिड व प्रोटीन का निर्माण करती है।
इस टेबलेट को लोगों ने लेना शुरू कर दिया और एक माह तक खाना खाने की जरूरत नहीं पड़ रही थी। इस च्युवैबल टेबलेट जीडीटी से अन्य बदलाव भी नजर आने लगे। घरों में किचन के संसाधनों की जरूरत खत्म हो गई। इतना ही नहीं फूड इंडस्ट्रीज लगभग समाप्त हो रही है।
इंसान को सब्जी, फ्रूट आदि का स्वाद मिलता रहे। इसलिए वैज्ञानिकों ने इस पर भी सफलता मिल गई। किचन के सामान की जरूरत खत्म होने पर घरों में इंसान को स्पेस मिलना शुरू हो गया। एक टेबलेट ने दुनियाभर में दोस्ती की मिसाल कायम कर दी। सभी स्नेह एवं सहयोग का व्यवहार करने लगे। साथ ही आबादी नियंत्रण की योजना की पालना होने लगी। ताकि भविष्य में ऐसी समस्या से दुबारा रूबरू न होना पड़े।
भारत सहित दुनियाभर में टेबलेट पहुंचने लगी। मेरे सहित अरूण, प्रोफेसर राधे मोहन आदि घरों में टेबलेट पहुंच गई। अब जिंदगी पहले से भी सुखद लगने लगी। बरसों बाद हमने दोस्तों सहित सैर सपाटे का प्रोग्राम बना लिया। अखबारों में समाचारों के शीर्षक भी सुहाने लग रहे थे। एक अखबार का टाइटल तो बहुत ही सुकून देने वाला था। टाइटल था एक गोली ने बदल दी पूरी दुनिया। इसप्रकार धरती पर जीवन फिर से पटरी पर आने लगा।

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