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विज्ञान लेखन के लिए विज्ञान राइटर को स्वयं रोमांचित होना महत्वपूर्ण है- अनिरूद्ध शर्मा

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विज्ञान संचार कार्यशाला में शोधार्थियों में झलका उत्साह

बीकानेर। विज्ञान लेखक विज्ञान को लेकर स्वयं रोमांचित होता है या नहीं यह महत्वपूर्ण है। उसके लेखन में रोमांच आएगा तभी पाठक उसे रूचि से पढ़ेगा। एक अच्छा कम्यूनिकेटर न हो तो भी विज्ञान की बातों को अच्छी तरह से कह सकता है। उसमें विषय को लेकर उत्साह होना चाहिए और शब्दों का चयन बेहद सरल होना चाहिए। ताकि सामान्य स्तर का व्यक्ति हमारे लिखे हुए को समझ सके। यह बात मंगलवार को दूसरे दिन सीनियर साइंस जर्नलिस्ट अनिरूद्ध शर्मा ने डूंगर काॅलेज में आयोजित विज्ञान संचार कार्यशाला में कही।

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शर्मा ने ह्युमैन जीनोम जैसे जटिल विषय को अपने लेख ‘अब खुला जीवन की किताब का पन्ना’ शीर्षक के साथ सरलता से प्रस्तुत किया। उन्होंने मिशन चंद्रयान की ग्राउंड रिपोर्टिंग को बेहद रूचिकर तरीके से समझाया और इसमें आने वाली चुनौतियों से परिचित कराया। उन्होंने स्टूडेंट्स को चुनौतियों को भी चुनौती देने के लिए प्रेरित किया। अनिरूद्ध शर्मा ने बताया कि भारत में 7 हजार से अधिक विज्ञान लैब है। इसमें 90 फीसदी सरकारी है। इसमें 20 प्रतिशत अकेले महाराष्ट्र में है। साथ ही बताया कि भारत में विज्ञान कहां कहां है। इसके अलावा निकट भविष्य में ‘विज्ञान रत्न’ जैसे पुरस्कार आएंगे इस बात की भी जानकारी शोधार्थियों को दी। शर्मा ने कहा कि अखबार में मौलिक रचना को ही महत्व मिलता है। वहीं गुगल पर मिली जानकारी में वैल्यू एडिशन करके कैसे उसे पठनीय बना सकते है इस बारे में स्टूडेंट्स को जानकारी दी। बाद में उन्होंने विद्यार्थियों के सवालों के जवाब उदाहरणों व तर्को के आधार पर दिए।

कार्यशाला के दूसरे तकनीकी सत्र में इंडियन इंस्टीट्यूट रिमोट सेंसिंग एवं डूंगर काॅलेज के जियोग्राफी डिपार्टमेंट के एचओडी डाॅ. राजेश भाकर ने जियो इन्फोर्मेशन टेक्नोलाॅजी के कम्पोनेंट्स के तहत इंदिरा गांधी नहर के पर्यावरण पर प्रभावों के बारे में बताया जिसमें उन्होंने जलभराव आदि बिंदूओं को समझाया कि कैसे-कैसे कहां कहां चुनौतियां आती है और उनके कैसे समाधान निकाल सकते हैं। डाॅ. भाकर ने माॅडलिंग के माध्यम से कैनाल के आने से इकोलाॅजी पर प्रभाव को समझाया है। साथ ही ग्राउंड वाटर रिचार्ज में सीजनल बदलाव को लेकर विभिन्न इमेज के जरिए स्पष्ट किया।

इस दौरान बीआईआरसी के फाउंडर डाॅ नरेन्द्र भोजक ने कपिल मुनि व देवहुति के संदर्भ में बताते हुए इस पर काम करने के लिए स्टूडेंट्स से आह्वान किया। साथ ही बताया कि लोकेशनल एडवांटेज को हमारे पाठयक्रम में शामिल करें तभी हम डवलपमेंट की बात कर सकते हैं। दूसरे सत्र में डूंगर काॅलेज के राजस्थानी के विभागाध्यक्ष डाॅ. बृजरतन जोशी ने पारम्परिक जल स्रोतो के महत्व को समझाते हुए उपयोगी जानकारी दी। अंतिम सत्र के बाद सभी शोधार्थियों को विज्ञान किट का वितरण किया गया।

बता दें कि ‘विज्ञान के साथ कदमताल’ विषयक यह वर्कशॉप राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग भारत सरकार के सानिध्य में वैज्ञानिक दृष्टिकोण सोसायटी जयपुर और बीआईआरसी राजकीय डूंगर काॅलेज के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की जा रही है। कार्यशाला का शुभारम्भ सीनियर साइंस जर्नलिस्ट अनिरूद्ध शर्मा, चैयरपर्सन डाॅ. एस एन जाटोलिया व वैज्ञानिक दृष्टिकोण के संपादक तरूण के जैन ने मां सरस्वती पर माल्यार्पण कर किया। कार्यक्रम में अंग्रेजी विभाग की एचओडी डाॅ. दिव्या जोशी , डाॅ. हेमेन्द्र भंडारी सहित 20 चयनित शोधार्थी उपस्थित रहे।

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