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बीकानेर रेलवे स्टेशन पर लुभा रहा है हजारों पाक विस्थापित महिलाओं का कढ़ाई का हुनर

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बीकानेर । बीकानेर में हजारों की संख्या में पाक विस्थापित महिलाएं अपने को प्रशिक्षण के जरिए निखार रहीं हैं। इन महिलाओं को यह प्रशिक्षण बीकानेर का उरमूल ट्रस्ट दे रहा है। प्रशिक्षण में कशीदाकारी की विभिन्न विधाओं से परिचित हो रहीं हैं और। इतना ही नहीं उरमूल इन पाक विस्थापित महिलाओं की आजीविका का भी प्रबंध कर रहा है। यहां बीकानेर रेलवे स्टेशन पर इन दिनों दो स्टाल भी लगा रखी है। जिसका “एक स्टेशन एक उत्पाद ” के तहत बीकानेर रेलवे स्टेशन पर डीआरएम ने उरमूल सीमांत, बज्जू के कशीदा एवम् अन्य हाथ से बने उत्पादों की बिक्री के लिए स्टॉल का उदघाटन बीते शनिवार को किया। इन स्टाल पर पाक विस्थापित महिलाओं द्वारा तैयार अलग अलग कलर और डिजाइन के आकर्षक कशीदाकारी किए कुर्ते, दुपट्टे आदि विक्रय के लिए उपलब्ध करवाए गए हैं। इसके लिए सारा रॉ मैटेरियल्स उरमूल द्वारा उपलब्ध करवाया जा रहा है। उरमूल की बिल्किश ने बताया कि दो दिन में करीब 45 00 रुपए की सेल हुई है। ये स्टाल्स 15 दिन के लिए लगाई गई है। इस कमाई में से कुछ हिस्सा इन पाक विस्थापित महिलाओं को दिया जाएगा। ये महिलाएं इस सहयोग के लिए उरमूल के अरविन्द ओझा को श्रेय देतीं है।

बता दें कि 1971 के युद्ध के दौरान पाकिस्तान से विस्थापन से प्रभावित बीकानेर जिले में रहने वाली इन महिलाओं ने सम्मान के साथ जीवन यापन करने के लिए पारंपरिक कढ़ाई के अपने कौशल का उपयोग किया है। बीकानेर शहर से 140 किमी दूर थार रेगिस्तान में स्थित, जो कठोर, शुष्क और बदलते रेत के टीलों और अत्यधिक तापमान के साथ कठिन है, ग्रामीण महिलाओं का जीवन किसी भी तरह से आसान नहीं है। लेकिन इसने महिला कारीगरों को गरिमा के साथ जीवन यापन करने से नहीं रोका है।

यह भी बता दें कि करीब दो दशकों तक ये महिलाएं बाड़मेर और जैसलमेर में शरणार्थी शिविरों में रहीं थीं। वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध पीड़ित इन विस्थापित महिलाओं को राजस्थान सरकार ने उस समय जमीन आवंटित की थी। विषम परिस्थितियों में सड़कों के किनारे इन्हें दयनीय स्थितियों में देख अरविन्द ओझा का ह्रदय द्रवित हो उठा। ओझा ने इन्हें ट्रस्ट के जरिए मदद करने की ठानी। उसके बाद से प्रशिक्षण और आजीविका का सिलसिला शुरू हो गया। ये महिलाएं एक विशेष प्रकार की कढ़ाई है जिसमें विभिन्न शैलियों जैसे टंका भारत, सूफ , पक्का, कंबिरी, खड़क, कच्चा और सिंधी शामिल हैं। इस हुनर को निखारने में एक प्लेटफॉर्म दिया।
उरमूल ने महिला विस्थापितों को उनके पारंपरिक कौशल को उन्नत करने के लिए समर्थन दिया, तकनीकी सहायता प्रदान की और उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ा।

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