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राजस्थान में घुड़ला पूजा की ऐतिहासिक परम्परा: वीरता, सम्मान और लोकआस्था का प्रतीक

✍️डॉ. जगदीश नारायण ओझा
राजस्थान
की लोक परम्पराएँ केवल उत्सव नहीं, बल्कि इतिहास, वीरता और समाज की मर्यादाओं से जुड़ी जीवंत स्मृतियाँ हैं। मारवाड़ क्षेत्र में मनाया जाने वाला घुड़ला पर्व ऐसी ही एक परम्परा है, जो शौर्य, नारी सम्मान और अन्याय के विरोध की ऐतिहासिक कथा से जुड़ी हुई है। इतिहासकार डॉ. जगदीश नारायण ओझा के अनुसार घुड़ला परम्परा का संबंध 15वीं शताब्दी के उस समय से है जब राव सातल देव जोधपुर के शासक थे और अजमेर पर मल्लू खान का अधिकार था। उसी काल में उसका एक क्रूर सेनापति घुड़ले खान अपनी निर्दयता के लिए कुख्यात था।


कन्याओं के अपहरण से शुरू हुई घुड़ला परम्परा
चैत्र मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी के दिन पीपाड़ के पास एक तालाब पर मारवाड़ की लगभग 140 कुंवारी कन्याएँ गणगौर पूजा के लिए एकत्रित थीं। उसी समय घुड़ले खान ने अवसर पाकर उन कन्याओं का अपहरण कर लिया और उन्हें अपने साथ ले जाने लगा।
जब यह समाचार जोधपुर पहुँचा तो राव सातल देव ने बिना विलम्ब सेना संग उसका पीछा किया।


कोसाणा का युद्ध और घुड़ले खान का अंत
जोधपुर के पास कोसाणा नामक स्थान पर दोनों पक्षों के बीच भीषण युद्ध हुआ, जिसे इतिहास में कोसाणा का युद्ध के नाम से जाना जाता है।
इस युद्ध में राव सातल देव ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए घुड़ले खान को पराजित कर उसका सिर काट दिया। कहा जाता है कि युद्ध में उसका सिर तीरों से पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो गया था।


राव सातल देव ने मुक्त कराई गई कन्याओं को वह कटा हुआ सिर दिखाया, जिससे वे अपनी मुक्ति का विश्वास कर सकें। कन्याओं ने अपनी खुशी और कृतज्ञता प्रकट करने के लिए उस छिद्रित सिर को पूरे नगर में घुमाया। यही घटना आगे चलकर घुड़ला परम्परा का आधार बनी।


मिट्टी के घड़े का प्रतीक कैसे बना ‘घुड़ला’
समय बीतने के साथ उस छिद्रित सिर के प्रतीक के रूप में मिट्टी का एक घड़ा बनाया जाने लगा, जिसमें कई छेद किए जाते हैं। इस घड़े को घुड़ला कहा जाता है।
घड़े के अंदर दीपक जलाकर महिलाएं इसे सिर पर रखकर गीत गाती हुई गलियों में घूमती हैं।
प्रमुख लोकगीत आज भी गूंजता है –
मारो तेल बळे, घी घाल… घुडलो घूमेला…”
यह गीत मारवाड़ की लोकस्मृति में राव सातल देव की वीरता की याद दिलाता है।


आज भी जीवित है यह परम्परा
राजस्थान में यह पर्व चैत्र कृष्ण अष्टमी से लेकर गणगौर तक मनाया जाता है।
इस दौरान महिलाएँ छिद्रित घड़ा लेकर नृत्य करती हैं, जिसके अंदर जलता दीपक होता है। यह दीपक प्रतीक है —
अंधकार पर प्रकाश की विजय का
अन्याय पर न्याय की जीत का
नारी सम्मान की रक्षा का
कई स्थानों पर अब खाली कलश लेकर भी घुड़ला नृत्य किया जाता है, लेकिन परम्परा का भाव वही है।


सामाजिक परम्परा और लोकआस्था
इस उत्सव के दौरान कुंवारी कन्याएं समूह बनाकर घर-घर जाती हैं और “घुड़ला” मांगती हैं।
लोग श्रद्धा से उन्हें तेल, अनाज, धन और उपहार देते हैं।
उत्सव के अंतिम दिन घुड़ला को पवित्र जल में विसर्जित कर दिया जाता है।


वीरता के साथ जुड़ी करुण कथा
इतिहास में यह भी उल्लेख मिलता है कि युद्ध के दौरान राव सातल देव गंभीर रूप से घायल हो गए थे।
कन्याओं को सुरक्षित घर पहुँचाने के कुछ समय बाद ही उनका देहांत हो गया।
इसी कारण यह पर्व केवल विजय का उत्सव नहीं, बल्कि एक वीर शासक के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक भी माना जाता है।


वीरता का जीवंत प्रमाण
घुड़ला पर्व मारवाड़ की संस्कृति में स्वाभिमान, नारी सम्मान और वीरता का जीवंत प्रमाण है।
यह परम्परा हमें याद दिलाती है कि शासक का सबसे बड़ा धर्म अपनी प्रजा, विशेषकर महिलाओं की रक्षा करना होता है, और जब समाज अन्याय के विरुद्ध खड़ा होता है तो इतिहास परम्परा बन जाता है।

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